हिन्दुओं का पवित्र पर्व रक्षाबंधन श्रावन मास की पूर्णिमा को देशभर में मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि के लिए उनकी कलाई पर राखी बांधती है और कामना करती है कि हर खतरे और कठिनाई के समय वह भाई उनकी रक्षा करेगा लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि उस भाई की रक्षा कौन करेगा? इस सवाल का जवाब हमें पूर्ण संतों-महात्माओं की वाणियों में मिलता है। उनके मुताबिक किसी भी त्यौहार की गहराई में रूहानियत के कई राज़ छुपे हुए हैं।
इन रूहानी रहस्यों को जानने के लिए अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे जीवन में कई ऐसे लोग होते हैं जो विभिन्न प्रकार से हमारी सहायता करते हैं। जब हम बच्चे होते हैं तो हमारे माता-पिता हमें खाना, आवास, खिलौने और सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसके अलावा युवा अवस्था में भी हमारे परिवार के सदस्य और दोस्त हमारी ओर मदद का हाथ बढ़ाते हैं। जब हम बुजुर्ग होते हैं तो हमारे बच्चे हमारी देखभाल करते हैं। इसके साथ-साथ हमारे जीवन में अनेक ऐसे लोग भी होते हैं जो कई प्रकार से हमारी सहायता करते हैं।
जब हम किसी पूर्ण सत्गुरु के चरण-कमलों में पहुंचते हैं तो हमें पता चलता है कि हमारे जीवन में जो भी हमारी थोड़ी सी भी मदद या सहायता करता है तो उसके पीछे उसका कोई न कोई स्वार्थ छुपा होता है। इस दुनिया में केवल एक पूर्ण सत्गुरु ही हैं जो हमें सच्चे मायनों में मददगार होते हैं। जब हमें कोई भी समस्या होती है तो हमें उनका मार्गदर्शन मिल ही जाता है। सत्गुरु हमें अपनी सुरक्षा के दायरे में रखते हैं लेकिन हम यह कभी भी नहीं जान सकते कि किस प्रकार सत्गुरु हमारी सहायता करते हैं? सत्गुरु दया के महासागर होते हैं। वे किसी की दुःख-तकलीफ को नहीं देख सकते। वे हमें सारी ज़िंदगी खतरों से बचाते हैं और हमारी रक्षा करते हैं। हमें सत्गुरु द्वारा दी जाने वाली सारी सहायता के बारे में ज्ञान नहीं होता। कई बार हमें यह भी पता नहीं होता कि हमें सत्गुरु के अदृश्य हाथ द्वारा बचाया जा रहा है। हम हैरान होते हैं और इसे चमत्कार का नाम देते हैं। हालांकि हमारे जीवन में ऐसे चमत्कार हमारे सत्गुरु की दयामेहर के कारण हमेशा होते रहते हैं। कई बार हमें पता चल जाता है कि हमें बचाने और सुरक्षित रखने के लिए अथवा हमारी सहायता करने के लिए कुछ चमत्कारिक हुआ है। यह हमारे सत्गुरु का अदृष्य हाथ होता है जो हमारी सहायता करता है।
हमारे सत्गुरु हमेशा हमारी सहायता करने के लिए मौजूद रहते हैं जब तक कि हम प्रभु से एकमेक नहीं हो जाते। वे हमारे अंतर में बैठे हैं, हमें अंतर में देख रहे हैं और हमारी रक्षा कर रहे हैं। एक बार जब हमें उनसे नामदान मिल जाता है तो वे षिवनेत्र पर बैठ जाते हैं और जो भी हमारे साथ हो रहा होता है, उससे वाकिफ होते हैं। वे बिना जताए हमारी रक्षा करते हैं और जीवन के सभी क्षेत्रों में हमारी सहायता करते हैं।
हम चाहें हमारे सत्गुरु द्वारा दी जाने वाली रक्षा को न जान पाएं अथवा न देख पाएं क्योंकि वे ऐसा बिना बताए और दर्शाए करते हैं और उनका बखान नहीं करते। वे वास्तव में निःस्वार्थ भाव से हमारी सहायता करते हैं और हमें पता भी नहीं चलने देते। वे हमारी सहायता करने के बदले में हमसे कोई धनराशि, शौहरत और यश नहीं चाहते। वे हमारी सहायता करते हैं क्योंकि वे हमसे बहुत प्रेम करते हैं और वे दया से भरपूर होते हैं। हम खुशकिस्मत हैं कि हमें अपने सत्गुरु के रूप में ऐसे रक्षक मिले हैं जो न सिर्फ इस दुनिया में हमारी सहायता करते हैं बल्कि अंतर के रूहानी मंडलों में भी हमारी रक्षा करते हैं। हमें हर कदम पर उनकी सहायता मिलती है, जब तक कि वे हमें परमात्मा से एकमेक नहीं करा देते। हमारे सत्गुरु द्वारा हमारे जीवन में हर पल की जाने वाली हमारी संभाल और प्रेम को ही सच्चा रक्षा बंधन कहते हैं।
