समीक्षा–विधायक शिव अरोरा, पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल विवाद

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हनुमान चालीसा पढ़ा। प्रभु प्रसन्न हुए और हाथो हाथ पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल पर मुकदमा दर्ज होने का भाजपाइयों को प्रसाद भी मिल गया वहीं जिला प्रशासन भाजपाइयों के सामने पूरी तरह नतमस्तक बना रहा।

सोमवार को जिला कलेक्ट्रेट पर जमकर ड्रामा हुआ। इसकी शुरुआत कमिश्नर दीपक रावत की एसआईआर समीक्षा बैठक के दौरान हुई। विधायक शिव अरोरा और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल के बीच आपत्ति, निस्तारण से शुरू हुई बहस गालीगलौज तक पहुंच गई,अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद मामला निबटा तो फिर जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर ही भाजपाइयों का धरना शुरू हो गया।

विधायक शिव अरोरा,पूर्व विधायक राजेश शुक्ला, भाजपा जिलाध्यक्ष कमल जिंदल,मेयर विकास शर्मा, दर्जा मंत्री उत्तम दत्ता,रामपाल सहित भाजपा के तमाम नेता धरने पर बैठ गए।भाजपाइयों का यह धरना आठ घंटे चला। धरने में भाजपाई हनुमान चालीसा का पाठ करते भी दिखाई दिए।अब हनुमान चालीसा पढ़ा था तो फल भी मिलना ही था आखिरकार जिला सहायक निर्वाचन अधिकारी ने पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल के खिलाफ पंतनगर थाने में मुकदमा कायम कराकर भाजपाइयों को प्रसन्नता फल का प्रसाद उपलब्ध करा दिया और भाजपाई अपनी जीत का जश्न मनाते हुए घर वापिस लौट गए।

बरहाल भाजपा के इस धरना प्रदर्शन से कई सवाल खड़े हो गए है,खासकर जिला प्रशासन सत्ता के कितने दबाव में था यह भी साफ दिखाई दिया।

 भाजपाइयों ने पूर्व विधायक ठुकराल के खिलाफ आठ दस घंटे प्रदर्शन तो किया लेकिन किसी ने ठुकराल के खिलाफ पुलिस तहरीर नहीं दी उल्टा प्रशासन पर मुकदमा दर्ज करने के लिए दबाव डाला।

सवाल यह है कि यदि किसी सरकारी बैठक में व्यवधान पैदा होता है तो मुकदमा दर्ज कराना या ना कराना,यह फैसला लेने का अधिकार किसका होता है प्रशासन का या फिर भाजपा का ?

 अगर प्रशासन मुकदमा दर्ज नहीं कराना चाहता, जैसा कि इस प्रकरण में दिखाई दिया था तो क्या भाजपा दबाव की राजनीति करके अपने विरोधियों के खिलाफ मुकदमें दर्ज करवाएगी।

कहा तो यह भी जा रहा है कि इस समीक्षा बैठक में पार्टियों के जिलाध्यक्ष,जिला महामंत्री आमंत्रित थे तो भाजपा और कांग्रेस के माननीय उस बैठक मौजूद क्यों थे?

सवाल यह भी है कि जो प्रशासन आंदोलित किसानों को कलेक्ट्रेट के भीतर तक घुसने नहीं देता और पूरे कलेक्ट्रेट परिसर को पुलिस छावनी में तैनात कर देता है ,उस प्रशासन ने भाजपा को डीएम कार्यालय के बाहर धरना प्रदर्शन की अनुमति कैसे दे दी,वो भी तब जब अदालत ने जिलाधिकारी परिसर में आंदोलन करने की मनाही के आदेश दे रखे है।

सवाल तो यह भी है कि जब भाजपा और कांग्रेस के दो माननीयों के बीच का विवाद था तो सहायक चुनाव अधिकारी को पूर्व विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराकर बीच में टाँग अड़ाने की क्यों जरूरत पड़ गई? साफ संकेत है कि पूरा प्रशासन सत्ता के आगे नतमस्तक रहा।