अगर पिता की बात मान लेते तो कभी नहीं बन पाते Tata Sons के चेयरमैन, खेती से शुरू हुआ था N Chandrasekaran का सफर

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( विशेष संवाददाता)

टाटा समूह की कमान करीब नौ साल तक संभालने के बाद एन चंद्रशेखरन ने चेयरमैन पद से हटने का फैसला किया है। चंद्रशेखरन का सफर (N Chandrasekaran Story) इसलिए खास है क्योंकि यह किसी कारोबारी परिवार से निकलकर कॉरपोरेट की ऊंचाइयों तक पहुंचने की कहानी नहीं है।

तमिलनाडु के एक छोटे से गांव मोहनूर के किसान परिवार में जन्मे चंद्रशेखरन ने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की और कभी खेत में काम करने की कोशिश भी की थी, लेकिन आगे चलकर कंप्यूटर ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी और यही रास्ता उन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित कारोबारी समूह के शीर्ष पद तक ले गया।

 

 

छह महीने खेती की, फिर समझ आया- यह मेरे बस की बात नहीं

 

एन चंद्रशेखरन का जन्म 1963 में तमिलनाडु के नमक्कल जिले के मोहनूर गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उनका परिवार खेती करता था और खेतों में केले समेत कई फसलों की पैदावार होती थी। उनके पिता श्रीनिवासन नटराजन वकील थे और परिवार की खेती भी देखते थे। चंद्रशेखरन ने भी शुरुआती दौर में पिता के साथ खेती के काम में हाथ बंटाया। लेकिन खेती में उनका मन नहीं लगा। पिता चाहते थे कि वे खेती ही करें, उन्होंने करीब छह महीने तक खेती में हाथ भी आजमाया, लेकिन फिर महसूस किया कि उनका रास्ता कुछ और है। 1983 के आसपास उन्होंने कोयंबटूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढ़ाई के बाद आगे क्या करना है, इस पर विचार किया था और उस समय कृषि को करियर के रूप में अपनाने की संभावना भी सामने आई थी। बाद में उन्होंने कंप्यूटर की पढ़ाई को चुना। यही वह मोड़ था जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। अगर चंद्रशेखरन खेती में ही टिक जाते, तो शायद भारत की कॉरपोरेट दुनिया को वह चेयरमैन कभी नहीं मिलता जिसने करीब चार दशक पहले एक इंटर्न के तौर पर टाटा समूह में कदम रखा था।

तमिल माध्यम के सरकारी स्कूल से कॉरपोरेट बोर्डरूम तक

 

चंद्रशेखरन की शुरुआती पढ़ाई तमिल माध्यम के सरकारी स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने कोयंबटूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एप्लाइड साइंस में स्नातक की डिग्री ली और रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से कंप्यूटर एप्लीकेशन में पोस्टग्रेजुएट डिग्री हासिल की। 1987 में उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में इंटर्न के तौर पर अपना करियर शुरू किया। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे कंपनी में जिम्मेदारियां संभालीं और 2009 में TCS के CEO और MD बने। यानी जिस व्यक्ति ने कभी खेत में काम करने की कोशिश की थी, वह कुछ ही दशकों में देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनियों में से एक का मुखिया बन चुका था।

पिता की एक सीख ने करियर की सोच बदल दी

 

चंद्रशेखरन की सफलता में परिवार से मिले संस्कारों की बड़ी भूमिका रही। उनके पिता ने उन्हें खर्च किए गए पैसे का हिसाब रखने, किफायत बरतने और मेहनत करने की सीख दी। उनके लिए किसी काम को सिर्फ थोड़े समय के लिए करना महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि लंबे समय तक पूरी प्रतिबद्धता के साथ उसमें टिके रहना ज्यादा मायने रखता था। चंद्रशेखरन के करियर में यह सोच साफ दिखाई देती है। उन्होंने 1987 में TCS में कदम रखा और कंपनी में लगातार जिम्मेदारियां बढ़ाते हुए शीर्ष तक पहुंचे। वह बाहरी व्यक्ति के तौर पर नहीं, बल्कि टाटा समूह के भीतर से निकले ऐसे प्रोफेशनल बने जिन्होंने कंपनी और समूह दोनों की कार्यशैली को करीब से समझा।

 

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TCS को बनाया टाटा समूह का सबसे बड़ा इंजन

 

TCS के CEO के तौर पर चंद्रशेखरन ने कंपनी में कई बड़े बदलाव किए। उनके नेतृत्व में कंपनी ने वैश्विक स्तर पर अपनी मौजूदगी मजबूत की और कारोबार तथा मुनाफे में तेज वृद्धि दर्ज की। उन्होंने बड़े और जटिल संगठन को छोटे, फोकस्ड बिजनेस यूनिट्स में बांटने की रणनीति अपनाई, जिससे ऑपरेशन और सर्विस डिलीवरी को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। उनके नेतृत्व में TCS ने कई बड़े अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के साथ अपना कारोबार बढ़ाया। Citigroup के बैक-ऑफिस कारोबार का करीब 500 मिलियन डॉलर में अधिग्रहण भी उनके कार्यकाल के बड़े सौदों में शामिल रहा।

यही प्रदर्शन उन्हें बाकी टाटा कंपनियों के प्रमुखों से अलग करता था। उस दौर में TCS समूह की सबसे वैल्युएबल और लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाली कंपनियों में शामिल थी। इसी वजह से जब टाटा समूह को रतन टाटा के बाद नए चेयरमैन की तलाश थी, तो चंद्रशेखरन की दावेदारी को नजरअंदाज करना मुश्किल था।

 

 

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फिर आया वह दिन, जब किसान परिवार का बेटा बना Tata Sons का चेयरमैन

 

2017 में एन चंद्रशेखरन को Tata Sons का चेयरमैन बनाया गया। वह टाटा समूह के पहले गैर-पारसी और प्रोफेशनल एग्जीक्यूटिव थे, जिन्हें समूह की शीर्ष कमान मिली। यह नियुक्ति अपने-आप में ऐतिहासिक थी, क्योंकि टाटा समूह की नेतृत्व परंपरा में पारसी समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी, लेकिन चंद्रशेखरन इसका अपवाद थे और इसी के साथ मोहनूर के खेतों से शुरू हुई कहानी Tata Sons के बोर्डरूम तक पहुंच चुकी थी। करीब नौ साल तक समूह का नेतृत्व करने के बाद अब चंद्रशेखरन ने अपने मौजूदा कार्यकाल के आगे दोबारा नियुक्ति नहीं लेने का फैसला किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, यह फैसला Tata Trusts के साथ उनके पुनर्नियुक्ति को लेकर लंबे समय से चल रहे मतभेदों के बीच आया है। वह फरवरी 2027 तक पद पर बने रहेंगे।